प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण

प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण क्या है ? (What is the Judicial Control over Administration)

प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण क्या है ?

(What is the Judicial Control over Administration)

प्रशासन पर बाहरी नियंत्रण के दो साधन है – प्रथम विधायी और दूसरा न्यायिक विधायक नियंत्रण कार्यपालिका शाखा की नीति तथा व्यय को नियंत्रित करता है और न्यायपालिका का नियंत्रण प्रशासनिक कार्यों को की वैधानिकता निश्चित करता है । इस प्रकार जब कोई सरकारी अधिकारी नागरिकों के संवैधानिक या मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करते हैं तो न्यायपालिका उनकी रक्षा करती है । न्यायपालिका का कार्य देश के कानूनों की व्यवस्था करना और उन्हें भंग करने वालों के लिए दंड की व्यवस्था करना है । लोक प्रशासन के संदर्भ में न्यायपालिका का प्रमुख उत्तरदायित्व नागरिक अधिकारों को उनकी सीमा में बनाए रखना है । साथ ही न्यायपालिका अत्याचार, अनियमितता, भ्रष्टाचार आदि दोषों पर  प्रतिबंध लगाती है । भारतीय न्याय-व्यवस्था में न्यायिक पुनरीक्षा को अपनाया गया है और न्यायपालिका को स्वतंत्र रखा गया है ।ग्रेट ब्रिटेन के समान भारत में भी कानून के शासन की व्यवस्था की गयी है । किंतु न्यायपालिका लोक प्रशासन पर अपना नियंत्रण कुछ परिस्थितियों, सीमाओं और निर्धारित अवसरों पर ही करती है । प्रो.  ह्वाइट के अनुसार निम्नलिखित स्थितियों में प्रशासन की शक्तियों पर न्यायपालिका द्वारा नियंत्रण रखा जाता है –

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अधिकारों एवं सत्ता का दुरुपयोग – जब लोक सेवा के अधिकारी अपने पद का प्रयोग किसी व्यक्तिगत कारण से दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने या किसी के प्रति बदले की भावना से करते हैं तो प्रभावित व्यक्ति न्यायालय की शरण ले सकता है ।

अधिकार क्षेत्र का अभाव – जब लोक सेवा के अधिकारी कोई ऐसा कार्य करते हैं जो उनके अधिकार-क्षेत्र से बाहर हैं और उससे किसी नागरिक को कोई हानि पहुँचती है, तो नागरिक अपने अधिकार की रक्षा के लिए न्यायालय की शरण ले सकता है । प्रभावित नागरिक जब न्यायालय में आवेदन करके यह इंगित करता है कि अमुक अधिकारी द्वारा किया गया कार्य उसके अधिकार-क्षेत्र या भौगोलिक क्षेत्र में नहीं आता और तथ्यों की जाँच के आधार पर क्षेत्र का दुरुपयोग प्रमाणित हो जाता है तो न्यायालय उन कार्यों को अवैधानिक घोषित कर देता है । इसे न्यायिक पुनरावलोकन का अधिकार कहा जाता है ।

वैधानिक त्रुटि – इस बात की पूरी संभावना रहती है कि सरकारी अधिकारी कानून की गलत व्याख्या करें और नागरिकों को कानून का गलत ढंग से प्रयोग कर हानि पहुँचाये । ऐसी स्थिति में प्रभावित व्यक्ति न्यायालय में अपने अधिकारों को रक्षा के लिए अपील कर सकता है । जाँच के पश्चात यदि न्यायालय ऐसा समझता है कि अधिकारी ने कानून की गलत व्याख्या की है तो उन कार्यों को न्यायालय असंवैधानिक  घोषित कर सकता है ।

तथ्यों की प्राप्ति में त्रुटि – जब कोई सरकारी अधिकारी अपने किसी प्रशासकीय कार्य में तथ्य का अच्छी तरह से पता लगाए बिना किसी नागरिक को उसे हानि पहुंचाने वाला कोई आदेश देता है तो नागरिक अपने अधिकार की रक्षा के लिए न्यायालय की सहायता ले सकता है ।

 समुचित प्रक्रिया की गलती – लोक सेवा के प्रायः सभी विभागों को निर्धारित प्रक्रिया के अंदर रहकर ही कार्य करना पड़ता है । लेकिन जब अधिकारी या विभाग कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्य नहीं करते हैं और किसी व्यक्ति को सरकारी अधिकारी के ऐसे कार्य से हानि पहुँचती है तो वह न्यायालय की शरण ले सकते हैं ।

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न्यायिक नियंत्रण के साधन

प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण के अनेक साधन होते हैं इनका प्रयोग करने की शक्ति न्यायपालिका को संविधान, सामान्य कानून तथा कुछ हद तक विधायिका के कानून द्वारा प्राप्त होती है । प्रशासन पर नियंत्रण रखने के लिए न्यायपालिका के पास अग्रलिखित साधन उपलब्ध है :1. सरकार के विरुद्ध अभियोग – नागरिकों को स्वतंत्रता एवं अधिकार संविधान द्वारा दिए जाते हैं और संविधान ही उनकी रक्षा करने के लिए उत्तरदायी हैं । इनकी रक्षा के लिए राज्य के विरुद्ध भी न्यायालय में अभियोग लगाया जा सकता है । भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300 में कहा गया है कि “भारत के विरुद्ध या उसके द्वारा भारतीय संघ के नाम से अभियोग प्रस्तुत किए जा सकते हैं । किसी राज्य की सरकार के विरुद्ध या उसके द्वारा उस राज्य के नाम से भी अभियोग प्रस्तुत किए जा सकते हैं । इसका आशय यह है कि सिर्फ केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा ही मुकदमा दायर नहीं किया जाता है बल्कि केंद्र और राज्य सरकार के विरुद्ध भी मुकदमा दायर किया जाता है और सरकार को एक विरोधी पक्ष के रूप में न्यायालय में ले जाया जा सकता है । भारत में सरकार के विरुद्ध संविदा और अपकार कृत्य संबंधी मुकदमे दायर किए जाते हैं । किंतु प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा पदों के दुरुपयोग के मामले या अन्य भ्रष्टाचार संबंधी मामले में अधिकारी के विरुद्ध व्यक्तिगत तौर पर मुकदमा चलाया जाता है ।2.   सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध अभियोग – समस्त सरकारी पदाधिकारी अपने कार्यों के लिए न्यायालय के प्रति उत्तरदायी होते हैं । सामान्य नागरिक की भाँति सरकारी पदाधिकारियों के विरुद्ध भी अभियोग प्रस्तुत किया जा सकता है या उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है । भारत में संविधान द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपालों को किसी भी प्रकार की न्यायिक करवाई से मुक्त रखा गया है । केवल संसद ही राष्ट्रपति पर महाभियोग लगा सकती हैं । भारत में न्यायाधीशों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त को भी कानूनी कार्रवाई से मुक्त रखा गया है ।3.    प्रशासनिक कार्यों तथा निर्णय का न्यायिक पुनरावलोकन – अमेरिका की भाँति भारत में न्यायपालिका कोई अधिकार प्राप्त है कि वह समय-समय पर प्रशासनिक कार्यों की देखभाल करती रहे ; यदि कोई प्रशासनिक निर्णय संविधान के विरुद्ध है तो उसको पुनरीक्षित कर असंवैधानिक घोषित करें । इस प्रकार न्यायिक पुनरीक्षा को नागरिकों के अधिकारों तथा स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साधन माना जाता है ।4.     कानूनी अपील – न्यायालय को प्रशासकीय आज्ञाओ और निर्णयों के विरुद्ध अपीलें सुनने का अधिकार प्राप्त है । न्यायिक नियंत्रण का एक साधन वही अपनाया जाता है जहाँ कानून द्वारा इस प्रकार की अपील करने का अधिकार दिया गया हो ।5. अन्य साधन – इसके अंतर्गत कार्यपालिका द्वारा जारी अध्यादेश, व्यवस्थापन अथवा हस्तांतरित व्यवस्थापन के अधीन अब बनाए गये कानून संविधान के अनुकूल नहीं है तो न्यायपालिका उनको और अस्वीकार कर सकती है । इसके अतिरिक्त न्यायालयों को भी शक्ति प्राप्त होती है कि प्रत्यायोजित विधायी शक्ति के किसी भी प्रश्न के संबंध में यह निर्धारित करें कि प्रत्यायोजित के लिए कानून सत्ता थी अथवा नहीं । यह निश्चित करना न्यायालयों का कर्तव्य है कि प्रत्यायोजित विधान संवैधानिक है अथवा नहीं, अर्थात जो व्यवस्थापन किया गया है या प्रत्यायोजित की सीमा में आता है अथवा नहीं ।

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महत्वपूर्ण न्यायिक उपचार

सरकारी अभिकरणों द्वारा किये गये शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध किये जाने वाले प्रमुख न्यायिक उपचार है – कानूनी भूल-चुक शक्तियाँ, सार्वजनिक कार्यो को संपन्न करने का उपचार, स्वेच्छापूर्ण शक्तियों का प्रयोग तथा असाधारण उपचार ।

असाधारण नयायिक उपचार

प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण रखने के लिए न्यायपालिका को उपर्युक्त अधिकारों के अतिरिक्त कुछ विशेष साधन प्राप्त है । इन विशेष साधनों को ही असाधारण उपचार कहा जाता है । भारतीय संविधान में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को कुछ विशेष प्रकार के लेख या आदेश जारी करने के अधिकार प्राप्त है । यह आदेश या लेख भी प्रशासन पर एक प्रकार से अंकुश रखने का काम करते हैं । उनकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है –
1.  बंदी प्रत्यक्षीकरण – लेटिन भाषा के शब्द “हैबियस कॉर्पस” का शाब्दिक अर्थ ‘शरीर को प्राप्त करना, है । बंदी प्रत्यक्षीकरण से तात्पर्य है कि न्यायालय उस व्यक्ति को जिसने व्यक्ति को बंदी बना रखा है, आदेश देता है कि वह बंदी बनाए गए व्यक्ति को सशरीर न्यायालय में उपस्थित करें, जिससे उसे बंदी बनाए जाने के औचित्य पर विचार किया जा सके । अगर उस व्यक्ति को बंदी बनाने बनाए जाने के पर्याप्त कारण उपलब्ध न हो तो बंदी बनाए गए व्यक्ति को न्यायालय मुक्त भी कर सकता है । इसका उद्देश्य है कि बिना पर्याप्त कारण के मनमाने ढंग से किसी भी व्यक्ति को बंदी  नहीं बनाया जाना चाहिए । परंतु मीसा (MISA) डी. आई. आर. (D.I.R) तथा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून ने न्यायालय के बंदी प्रत्यक्षीकरण अधिकार पर प्रहार किया है ।2.     परमादेश – लेटिन शब्द “मैनडेमस” का अर्थ है ‘समादेश’ या ‘अधिदेश’ अथवा ‘किसी को आज्ञा देना’ । परमादेश लेख द्वारा न्यायालय सार्वजनिक निकाय, सर्वजनिक कर्मचारी निगम, या संस्था को आदेश दे सकता है कि वह अपने कर्तव्य का पालन कानून के अनुसार करें ।3.     प्रतिषेध – प्रतिषेध लेख उच्च न्यायालय द्वारा निम्न श्रेणी के न्यायालयों को उस समय जारी किया जाता है जब वह अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर जा रहे हो । यह लेख अधीनस्थ न्यायालयों को विवादपूर्ण विषयों पर विचार करने से रोकने के लिए प्रसारित किया जाता है । इसे केवल न्यायिक या अर्द्धन्यायिक न्यायाधिकरणों के विरुद्ध ही जारी किया जा सकता है ।4.  उत्प्रेषण – लैटिन शब्द “सरटीओरेरी” का अर्थ ‘प्रमाणित होना’ । उत्प्रेषण उस लेख का नाम है जो किसी उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को उस समय जारी किया जाता है जब वह किसी मुकदमे की कार्रवाई से असंतुष्ट हो । जिसके अंतर्गत उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालय से सभी प्रकार के रिकॉर्ड इस बात की जाँच-पड़ताल के लिए अपने पास मँगवा सकता है कि अधीनस्थ न्यायालय अपने अधिकार-क्षेत्र से बाहर तो नहीं गया है । इस लेख को प्राय: न्यायिक कार्य के विरुद्ध ही प्रसारित किया जाता है । इस आधार पर अधीनस्थ अदालत का निर्णय रुक जाता है । यह लेख परमादेश और निषेधाज्ञा के गुणों का मिश्रण होता है क्योंकि इसके अनुसार कुछ करने की आज्ञाएँ दी जाती है ।5.     अधिकार पृच्छा – लेटिन शब्द ‘को वारण्टो’ का शाब्दिक अर्थ है  ‘किसी अधिपत्र’ या ‘प्राधिकार द्वारा’ । अधिकार-पृच्छा लेख द्वारा कोई व्यक्ति यदि गैर-कानूनी ढंग से किसी पद या अधिकार का प्रयोग करता है तो न्यायालय उसे ऐसा करने से रोक सकते हैं । इस लेख का उद्देश सरकारी पद संबंधित किसी दावे की जाँच करना है ।

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न्यायिक नियंत्रण की सीमाएँ

भारत में लोक प्रशासन पर न्यायिक नियंत्रण की सीमाएँ इस प्रकार हैं :

1.     न्यायालय स्वयं हस्तक्षेप नहीं करते जन-हित में वे तभी हस्तक्षेप करते हैं जब कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह उनके समक्ष प्रार्थना करता है ।2.     न्यायालयों की प्रक्रिया अत्यंत खर्चीली एवं जटिल होती है ।3.     न्यायिक नियंत्रण खर्चीला होने के साथ-साथ पर्याप्त समय भी लेता है, इसे सरल  बनाना आवश्यक है ।4.     अनेक प्रशासकीय कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार से बाहर रखा जाता है । ऐसे प्रशासकीय कार्यों का न्यायिक पुनरावलोकन या न्यायिक समीक्षा नहीं की जाती है ।5.     न्यायिक नियंत्रण घटना के बाद की प्रक्रिया होती है । जब कोई घटना घट जाती है तब उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और तभी न्यायिक प्रक्रिया प्रारंभ होती है ।6.     आजकल प्रशासन का कार्य अत्यधिक तकनीकी तथा विशेषीकृत होता जा रहा है । न्यायालयों के न्यायाधीश सामान्यत: विशेष तकनीकी योग्यता के अभाव में समुचित निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होते हैं ।

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