बड़े लक्ष्य के लिए बदलनी होगी राह Way to change for big goal

बड़े लक्ष्य के लिए बदलनी होगी राहWay to change for big goal

Way to change for big goal

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के सामने वर्ष 2024 तक पांच टिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखा है । पांच टिलियन डॉलर यानी पांच हजार अरब डॉलर। इसमें कोई संशय नहीं कि प्रधानमंत्री ने सरकारी कार्यकुशलता में बेजोड़ सुधार हासिल किया है । शीर्ष अधिकारी आज चाहते हैं कि वे प्रधानमंत्री की बताई दिशा के अनुसार लक्ष्यों को प्राप्त करें । सरकार ने बैंकों से धन लेकर गबन करने वाले निजी बड़े उद्यमियों पर नकेल कसी है, फिर भी पांच टिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लिए कुछ नीतिगत परिवर्तन करने की भी जरूरत हो सकती है । आम बजट की पूर्वसंध्या पर मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यन ने कहा था कि देश को निवेश आधारितआर्थिक विकास की राह पर चलना होगा । सरकार का मानना है कि ब्याज दर न्यून होने से उद्यमियों द्वारा भारी मात्र में ऋण लेकर निवेश किया जाएगा । वे फैक्टियां लगाएंगे, रोजगार के अवसर सृजित होंगे और उस आय से लोग उन्हीं फैक्टियों में बने माल को खरीदेंगे । यहां प्रश्न है कि पहले मांग आएगी अथवा पहले निवेश ? मांग उत्पन्न होने से निवेश आएगा अथवा निवेश करने से मांग उत्पन्न होगी ? इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है । जैसे किसी उद्यमी ने कपड़ा बनाने की फैक्ट्री स्थापित की । उसमें कुछ कर्मियों को रोजगार दिया। उस एवज में मिले वेतन से कर्मियों ने कपड़े खरीदे, लेकिन वे फैक्ट्री में बने सभी कपड़ों की खपत नहीं कर सकते । कहीं से बाहरी मांग आएगी तभी फैक्ट्री सफल होगी ।

उद्यमी पहले व्यापक मांग देखता है और फिर निवेश करता है । अपने देश में पहले ब्याज दरें 10 से 15 प्रतिशत के बीच रहती थीं फिर भी उद्यमी निवेश करते थे, क्योंकि बाजार में मांग थी । आज ब्याज दर कम है, परंतु वे निवेश नहीं कर रहे हैं । निवेश आधारित आर्थिक विकास पर पुनर्विचार करने की जरुरत है । आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार पूर्वी एशिया और चीन ने निवेश आधारित आर्थिक विकास हासिल किया । सच यह है कि इन देशों के विकास के पीछे विकसित देशों की मांग थी । उस मांग की पूर्ति के लिए इन देशों ने निवेश किया था । यानी पहले निर्यात की मांग आई और उसके बाद निवेश आया, लेकिन अब चीन द्वारा अपनाई गई निर्यात-एवं निवेश आधारित नीति को आज हम नहीं अपना पाएंगे । कारण यह है कि 1980-90 के दशक में विकसित देशों में तकनीकी आविष्कार हो रहे थे जैसे इंटरनेट और पर्सनल कंप्यूटर । इन आविष्कारों के चलते इन देशों की आय और खपत बढ़ रही थी । इस खपत की पूर्ति के लिए उन्होंने चीन में निवेश किया । आज विकसित देशों में इस प्रकार के तकनीकी सुधार कम हो रहे हैं । उनकी अर्थव्यवस्थाएं नरम पड़ी हुई हैं । इसलिए निर्यात के आधार पर भी हम आज निवेश को आकर्षित नहीं कर पाएंगे । दूसरा कारण यह है कि रोबोट के कारण विनिर्माण का विकसित देशों को वापस जाना शुरू हो गया है। चीन और भारत में उपलब्ध सस्ते श्रम का लालच अब समाप्त हो गया है । इन कारणों से चीन द्वारा अपनाई गई निर्यात-निवेश आधारित नीति को आज हम लागू नहीं कर सकेंगे । सरकार को चाहिए कि घरेलू मांग आधारित विकास की नीति को अपनाए ।

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि देश औपचारिक अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रहा है । अनौपचारिक यानी नकद के धंधे कम हो रहे हैं । इसमें कोई संशय नहीं कि नोटबंदी और जीएसटी से नकद के धंधे पर कुछ अंकुश लगा है, लेकिन जीएसटी का संग्रह सपाट है । हालांकि रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है । इसका एक कारण यह हो सकता है कि उद्यमी जीएसटी में दिखावटी रजिस्ट्रेशन कराकर नकदी में कार्य कर रहे हैं । औपचारिकता का अर्थव्यवस्था को लाभ मिलता नहीं दिखा, लेकिन औपचारिकता के कारण मांग का संकुचन हो रहा लगता है । जीएसटी और नोटबंदी से छोटे उद्यमों का संकट बढ़ा । कुछ महीने पहले दिल्ली के एक ओला ड्राइवर ने बड़ी मार्मिक कहानी बताई । वह तीस साल से साड़ी में एंब्राइडरी का काम करा रहे थे । उनके तीन-चार कर्मी थे । नोटबंदी के कारण उनके पेमेंट रुक गए । उनका धंधा बंद हो गया । उन्हें अपने कर्मचारी हटाने पड़े और खुद ड्राइवर बनने को मजबूर हुए । उनके कर्मियों और उनकी स्वयं की मांग कम हो गई । इस प्रकार औपचारिकता के कारण बाजार में मांग कम हुई है । मांग कम होने से निवेश कम हुआ है । अत: औपचारिक अर्थव्यवस्था को अपनाना अच्छा है, परंतु यह आर्थिक विकास का मंत्र नहीं हो सकता है ।

आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि छोटे उद्योगों को एक निश्चित समय तक ही एक छोटे उद्योग का संरक्षण उपलब्ध होना चाहिए । आशय यह है कि बच्चे को आजीवन बच्चा बने रहने के लिए हमें प्रलोभन नहीं देना चाहिए । यह बात छोटे उद्योगों पर लागू नहीं होती है । यह उदाहरण सही नहीं है । सही उदाहरण है कि दौड़ लगाने वाले अलग-अलग रफ्तार के होते हैं । धीरे दौड़ लगाने वाले ज्यादा तेज नहीं दौड़ पाते । उनके लिए जरूरी है कि वे धीमी दौड़ से चलने वाले उद्योग ही चलाएं और आजीवन चलाएं । साड़ी में एंब्राइडरी का काम तीस साल से करने वाले उद्यमी को यदि दस साल बाद छोटे उद्योगों का संरक्षण समाप्त कर दिया जाता तो उनका धंधा बंद हो जाता, क्योंकि उनकी क्षमता ही नहीं थी कि वे इससे बड़े उद्योग को संभाल सकें । अत: छोटे उद्योगों को आजीवन संरक्षण देना चाहिए जिससे देश में रोजगार बने और मांग स्थापित हो । बाजार में मांग होगी तो निवेश स्वत: आएगा ।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार हमें विदेशी बचत के ऊपर ध्यान देना चाहिए । यह सही है कि निवेश के लिए यदि हम विदेशी ऋण लें तो इसमें कोई हानि नहीं है । जैसे यदि बुलेट ट्रेन बनानी है तो इसके लिए जापान से ऋण लेना ठीक है, लेकिन हम अपनी बचत की बर्बादी कर रहे हैं और विदेशी बचत के पीछे भाग रहे हैं । जैसे वर्तमान बजट में 70,000 करोड़ रुपये की विशाल राशि को सरकारी बैंकों में पूंजी निवेश के लिए आवंटित किया गया है । इसके स्थान पर यदि सरकारी बैंकों का निजीकरण कर दिया जाता तो हम इससे सौ गुना ज्यादा रकम हासिल कर सकते थे और उसका उपयोग निवेश के लिए कर सकते थे । बजट में कहा गया कि एयर इंडिया के निजीकरण के लिए पुन: प्रयास किए जाएंगे । यह सही है, लेकिन केवल घाटे में चल रही सरकारी इकाइयों का निजीकरण करने से काम नहीं चलेगा । लाभ में चल रही इकाइयों का भी निजीकरण करने की जरूरत है । इस राशि का उपयोग अंतरिक्ष में शोध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एवं डाटा एनालिसिस इत्यादि में किया जाए तो अर्थव्यवस्था में मांग उत्पन्न होगी और निवेश स्वयं आएगा । प्रधानमंत्री मोदी को पांच टिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रखने के लिए साधुवाद, लेकिन बेहतर होगा कि निवेश आधारित विकास के स्थान पर मांग आधारित विकास को अपनाएं तो सफलता मिलने की संभावना अधिक होगी ।

(लेखक वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं
आइआइएम बेंगलूर के पूर्व प्रोफेसर हैं)
पांच टिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य सही है, लेकिन बेहतर होगा कि निवेश आधारित विकास के स्थान पर मांग आधारित विकास को अपनाएं तो सफलता मिलने की संभावना अधिक होगी
डॉ. भरत झुनझुनवाला

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